उत्तराखंड में कास्त कला को उभारने की है  जरुरत

उत्तराखंड के पहाड़ों में हर घर की शान बढ़ाने वाली काष्ठ कला अब स्मृति चिन्हों तक ही सिमट कर रह   गई है। किसी जमाने में घर बनाने से लेकर घरेलू उपयोग में आने वाले लकड़ी के सामान में नक्काशी का प्रचलन था। लेकिन अब काष्ठ कला धीरे-धीरे लुप्त होती   जा रही है। पहाड़ों में भी सीमेंट व कंकरीट के मकान बनने से गांवों में प्राचीन काष्ठ कला के नमूने जो हमें पहले देखने को मिलते थे  वो अब देखने में कम आपते है  मकान बनाने के लिए लकड़ी न मिलने से अब यह काष्ठ कला काम भी खत्म होता जा रहा है। इससे इस व्यवसाय से हस्तशिल्प भी आजीविका के लिए दूसरे साधन अपनाने व  पलायन के लिए मजबूर हो रहे हैं।  किसी जमाने में उत्तराखंड की काष्ठ शिल्प में एक अलग पहचान थी। गांवों में पेहले पुराणी शैली के  मकानों  का प्रचलन था जो की अब हमें कम देखने को मिलता है लेकिन आज  आज भी प्राचीन काष्ठ कला ने अपनी छाप छोड़ी है। हस्तशिल्पियों के हाथों से लकड़ी पर उकेरी गई नक्काशी हर घर की शान होती थी। वहीं, लकड़ी से पाली, ठेकी, कुमैयां भदेल, नाली समेत अन्य प्रकार के बर्तनों को इस्तेमाल किया जाता है ।  वर्तमान में काष्ठ कला से जुड़े परिवारों के सामने भी रोजी रोटी का संकट हो गया है, जिससे वे अब दूसरे व्यवसाय को अपनाने के लिए पलायन करने को विवश हो गये है । काष्ठ कला के हस्तशिल्पियों का कहना है कि सरकार को इस प्राचीन हस्तशिल्प कला पर गंभीरता से ध्यान दिया देना चाहिए।   यह व्यवसाय को स्वरोजगार का बहुत बड़ा माध्यम बन सकता है। साथ ही केदारनाथ व चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को लकड़ी से बने मंदिरों के प्रतीक चिन्ह भेंट किए जा सकते हैं, जो लंबे समय तक यादगार तो रहेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर कई परिवारों की आजीविका भी मजबूत होगी।

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